कमजोर – 3
कमजोर
विशाल आम के पेड़ की विशाल जड़ों के पास एक नन्हा, सीधा-साधा और भोला-भाला खरगोश का बच्चा रहता था।
उसकी मखमली सफ़ेद रंगत, चमकती लाल आँखें और हमेशा काँपते-से गुलाबी कान उसकी सरलता की गवाही देते थे।
वह खरगोश का बच्चा पूरे दिन अकेले ही उस आम के पेड़ के इर्द-गिर्द उछल-कूद करता, हरी-हरी कोमल घास चरता और अपनी बनाई हुई छोटी-सी बिल में विश्राम करता।
उस घने जंगल में उसका कोई संगी-साथी या मित्र नहीं था। उसका जीवन बिल्कुल एकाकी था, लेकिन उसके मन में एक खास उम्मीद हमेशा जीवित रहती थी।
वह उम्मीद थी— लोमड़ी दीदी।
लोमड़ी दीदी पड़ोसी जंगल में रहती थीं। वह बहुत चतुर, समझदार और दयालु थीं।
जब भी उन्हें समय मिलता, वे तीसरे या चौथे दिन उस छोटे खरगोश का हाल-चाल पूछने ज़रूर आती थीं।
जिस दिन लोमड़ी दीदी आतीं, नन्हे खरगोश के चेहरे पर अद्भुत खुशी छा जाती।
उसके चेहरे पर फैली नटखट और मासूम मुस्कान उसकी सारी उदासी को धो देती थी।
दोनों दिन भर साथ खेलते, बातें करते और जंगल की पगडंडियों पर चहलकदमी करते।
परंतु जब शाम की लालिमा आसमान में ढलने लगती, तो लोमड़ी दीदी के जाने का समय हो जाता। जाने से पहले लोमड़ी दीदी बड़े स्नेह से खरगोश के सिर पर हाथ फेरतीं और उसे दुलारतीं।
उनके जाते ही खरगोश का मासूम चेहरा अचानक उदास हो जाता। उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में मायूसी तैरने लगती और वह अपने बिल के मुहाने पर उदास बैठ कर दूर तक लोमड़ी दीदी को जाते हुए देखता रहता।
एक दिन, मौसम बेहद सुहाना था। ठंडी-ठंडी हवाएँ चल रही थीं। खरगोश के बच्चे ने पेट भरकर ताज़ा घास और मीठे फल खाए और आम की शीतल छाया में आराम कर रहा था।
वह अपनी छोटी-सी दुनिया में बेहद निश्चिंत और खुश था।
तभी अचानक शांत वातावरण में पत्तों की खड़खड़ाहट और ज़ोर-ज़ोर से उछलने-कूदने की आवाज़ें आने लगीं।
पड़ोसी जंगल से एक शरारती और आवारा बंदर उछलता-कूदता हुआ इस शांत जंगल के भीतर घुसा। बंदर का स्वभाव बेहद उत्पाती और चालाक था। उसकी आँखों में एक अजीब-सी दुष्टता और शरारत भरी हुई थी।
वह सीधा उसी आम के पेड़ पर जा चढ़ा और पके हुए आम तोड़-तोड़कर खाने लगा।
आम खाते-खाते अचानक उसकी नटखट और दुष्ट नज़र नीचे आराम कर रहे छोटे खरगोश पर पड़ी।
बंदर के खुराफाती दिमाग में एक खोट सूझी। उसने खरगोश को तंग करने की नीयत से आम खाया और बची हुई भारी गुठली को पूरे ज़ोर से खरगोश के बच्चे पर फेंककर मारा।
लेकिन कहते हैं न— “दूसरों के लिए गड्ढा खोदने वाला खुद उसमें गिरता है।” निशाना साधने के चक्कर में बंदर का पैर पेड़ की गीली डाल से फिसल गया।
“धड़ाम!”
एक ज़ोरदार आवाज़ के साथ बंदर सीधे ज़मीन पर आ गिरा।
पीठ और कमर के बल गिरने से बंदर को तेज़ दर्द हुआ। उसके चेहरे पर छलावा और चालाकी की जगह ज़ोरदार पीड़ा के भाव आ गए।
उसकी आँखें दर्द से मिचमिचाने लगीं और वह चीख-चीख कर रोने लगा— “आह! ऊह! मेरी कमर टूट गई! बचाओ-बचाओ!”
बंदर की तेज़ चीखें सुनकर जंगल के अन्य जानवर— हिरण, गिलहरी, भालू और गीदड़— भागते हुए घटनास्थल पर पहुँचे।
जानवरों ने तड़पते हुए बंदर को देखा तो तुरंत उसे सहारा देकर उठाया और बिठाया।
बंदर ने जब देखा कि सभी जानवर उसके प्रति सहानुभूति दिखा रहे हैं, तो उसके चालाक दिमाग ने तुरंत एक नई चाल चली।
उसके रोते हुए चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान उभरी, जिसे उसने तुरंत आंसुओं के पीछे छिपा लिया।
उसने रोते-रोते झूठी हमदर्दी बटोरने के लिए खरगोश की तरफ उंगली उठाई।
बंदर ने काँपती आवाज़ में कहा, “हे जंगल के निवासियों! इस नन्हे खरगोश को देखो, इसने मुझे आम की भारी गुठली उठाकर इतनी ज़ोर से मारी कि मैं अपना संतुलन खो बैठा और पेड़ से नीचे आ गिरा! मेरी यह हालत इसी मासूम दिखने वाले खरगोश की वजह से हुई है!”
यह सुनते ही जंगल के सभी जानवरों के चेहरे पर आश्चर्य और गुस्सा उमड़ पड़ा। वे नन्हे खरगोश को घूरने लगे।
छोटा खरगोश यह सब देखकर स्तब्ध रह गया। भय और घबराहट से उसका पूरा शरीर थर-थर काँपने लगा। उसकी आँखों में आँसू छलक आए।
उसने डरते-डरते, रुँधे हुए गले और काँपते हाथों से सभी जानवरों के सामने अपनी बेगुनाही की गुहार लगाई।
वह रोते हुए गिड़गिड़ाया, “प्लीज सुनिए… मेरी बात तो सुनिए! बंदर भैया सफ़ेद झूठ बोल रहे हैं! मैंने कुछ नहीं किया! मैं तो चुपचाप बैठा हुआ था!”
लेकिन जंगल के जानवर बंदर के रोने और नाटक को देखकर उसकी बातों पर विश्वास करने लगे थे। मासूम खरगोश की कोई बात नहीं सुन रहा था।
ठीक उसी तनावपूर्ण क्षण में, वहाँ लोमड़ी दीदी का आगमन हुआ।
लोमड़ी दीदी की शानदार और शांत गरिमा देखकर सभी जानवर उनके सम्मान में पीछे हट गए, क्योंकि पूरा जंगल लोमड़ी दीदी की बुद्धिमत्ता, निष्पक्षता और मान-सम्मान का कायल था।
सभी जानवरों ने मिलकर लोमड़ी दीदी को बंदर की आपबीती और खरगोश की कथित ‘शरारत’ के बारे में बताया।
लोमड़ी दीदी ने शांत और गंभीर चेहरे के साथ पूरी बात सुनी।
उनकी पारखी आँखों ने तुरंत भाँप लिया कि दाल में कुछ काला है। वे जानती थीं कि इतना छोटा और कमजोर खरगोश किसी भारी गुठली को इतनी ऊँचाई तक फेंक ही नहीं सकता कि कोई बंदर पेड़ से गिर जाए।
लेकिन न्याय प्रमाण माँगता था, इसलिए लोमड़ी दीदी ने अपने चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान लाते हुए स्थिति को संभालने का फैसला किया।
लोमड़ी दीदी ने बंदर को अपने पास बुलाया।
उन्होंने बड़े ही शांत स्वर में कहा, “बंदर भैया! जिस डाल से तुम गिरे थे, ज़रा हिम्मत करके फिर से उसी डाल पर जाकर बैठ जाओ।”
बंदर अपने मन ही मन बहुत खुश हुआ। उसने सोचा, “वाह! आज तो लोमड़ी मैडम जी भी मेरी हाँ में हाँ मिला रही हैं। आज तो अपनी ही अदालत में सबका मनोरंजन करके, हँसी-मज़ाक उड़ाकर दिन बहुत अच्छा बीतेगा!”
बंदर अपने चेहरे पर झूठा दर्द का नाटक बनाते हुए धीरे-धीरे आम के पेड़ की उसी डाल पर जाकर बैठ गया।
इसके बाद लोमड़ी दीदी ने नन्हे खरगोश के बच्चे को अपने पास बुलाया। खरगोश डर के मारे आँखें नीची किए हुए लोमड़ी दीदी के पास आया।
लोमड़ी दीदी ने प्यार से खरगोश के सिर पर हाथ रखा और कहा, “खरगोश भैया! अब तुम ज़मीन से यह आम की गुठली उठाओ और अपनी पूरी ताकत लगाकर ऊपर बैठे बंदर भैया की तरफ फेंको!”
लोमड़ी दीदी का यह आदेश सुनकर वहाँ मौजूद सभी जानवर उत्सुकता से देखने लगे।
नन्हे खरगोश ने काँपते हाथों से ज़मीन पर पड़ी आम की भारी गुठली को उठाया।
उसने अपने नन्हे-छोटे हाथों से अपनी पूरी शारीरिक ताकत लगाई, अपना पूरा ज़ोर लगाया और गुठली को ऊपर बंदर की तरफ फेंका।
खरगोश के नन्हे हाथों से छूटी गुठली महज़ कुछ इंच ऊपर हवा में उछली और गुरुत्वाकर्षण के कारण वापस ज़मीन पर आ गिरी।
खरगोश में इतनी शारीरिक क्षमता ही नहीं थी कि वह उस गुठली को पेड़ की ऊँचाई तक भी पहुँचा सके!
यह नज़ारा देखते ही जंगल के सभी जानवरों की आँखें खुली की खुली रह गईं।
सभी जानवरों के चेहरे पर बंदर के प्रति गुस्सा और खरगोश के प्रति सहानुभूति तैर गई।
अब सबकी समझ में पूरी तरह आ चुका था कि बंदर की बात एक सफेद झूठ थी और वह सभी को बेवकूफ बना रहा था।
पूरे वातावरण में जानवरों के ठहाके और हँसी गूँजने लगी। सभी जानवर बंदर का मज़ाक उड़ाने लगे।
पेड़ पर बैठा बंदर अब पूरी तरह बेनकाब हो चुका था। उसके चेहरे पर जो घमंड और चालाकी थी, वह पल भर में उड़ गई। उसकी जगह शर्मिंदगी, घबराहट और डर ने ले ली।
बंदर ने खिसियानी हँसी हँसते हुए और अपनी नीची नज़रें छिपाते हुए नीचे उतरकर कहा, “अरे… अरे भाई! मैं तो बस तुम सबको ‘अप्रैल फूल’ बना रहा था! मैं तो बस सब का मनोरंजन कर रहा था!”
जैसे ही बंदर पेड़ से नीचे उतरा, उसे लगा कि अब जंगल के सभी गुस्से से भरे जानवर उसकी धुनाई करेंगे।
बंदर की हवा गुम हो गई। वह बिना एक पल भी गंवाए, अपनी जान बचाकर जंगल से बाहर की तरफ सरपट भागा।
गुस्साए जानवरों ने उसका पीछा किया, लेकिन बंदर ‘नौ दो ग्यारह’ (एक-दो-तीन-चार-नौ-दो-ग्यारह) होकर हवा की गति से भाग निकला और आँखों से ओझल हो गया।
खरगोश ने लोमड़ी दीदी की पीठ पर बैठकर अपने पुराने आम के पेड़ को अलविदा कहा।
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